Monthly Archives: October 2017

URJA Editorial-यथा प्रजा, तथा राजा।

इस संस्करण में; आज की परिस्थिति में सार्वजनिक प्रशासन और स्थानीय राजनीती पर  सामाजिक व्यवहार का असर।

यह लेख हमारे समाज की एक बीमारी; विचारहीन तरफदारी, पर रौशनी डालेगा जो दिल्ली की बिगड़ी हुई शासन व्यवस्था का बहुत बड़ा कारण है.

बिना सोचे समझे, बुद्धि के प्रयोग के बिना कोई पक्ष ले लेना एक आदत सी  बन गयी है. सोशल मीडिया के आने से यह मनोवृत्ति और भी बढ़ती जा रही है. किसी भी मुद्दे को विचाराधीन करने से पहले ही बेबाक हो बयान दे देना या फिर पड़ोस में होने वाली हर अहम् बहस पर भाई-भतीजावाद करने लगना, नागरिकों के लिए अपने ही नुक्सान का कारण बनता जा रहा है. दुःख की बात तो यह भी है की हम इस बात पर ध्यान ही  नहीं दे रहे हैं की किस कदर यह सामाजिक परिस्थिति हमारा बेडा ग़र्क़ कर रही है

जब भी कूड़ा करकट, वायु प्रदूषण, गन्दगी, टूटी सड़क, जाम हुई नालियां या फिर सार्वजनिक भूमि पर अवैध अतिक्रमण की बात सामने आती है तो उसके पीछे बहुत हद तक इस प्रवृति का हाथ होता है

गौर फरमाइए, आपके इलाके में अगर नाली बंद हो जाये तो क्या सब निवासी एक ही आवाज़ में बोलेंगे? या फिर अगर सड़क टूटी हो तो क्या सब एक साथ होकर अपने पार्षद, विधायक और संसद के पास शिकायत ले कर जायेंगे ? हरगिज़ नहीं। साधारण से साधारण नागरिक भी, बिला वजह पार्टीवाद का हिस्सा बन जायेगा. अगर ऐसा नहीं होता तो आपके इलाके की सड़कें, नालिया, और ढलाव साफ़ होते , और सरकारी ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा होते ही रोक दिया जाता।

हम अक्सर अपनी विफ़लता को राजनीती बोल, नेता के सर पर मढ़ देते हैं लेकिन ध्यान दीजिये, ये बीमारी तो हमने खुद पाली है , नेता का क्या दोष?

एक उद्धरण के माध्यम से इस मुसीबत पर प्रकाश डालता हूँ

अभी कुछ ही समय पहले दिल्ली के एक क्षेत्र में शराब की दुकान को लेकर कुछ ऐसा ही  हुआ. शुरुआत में ऐसा प्रस्ताव की शराब की दूकान रिहाइशी इलाके में खुलेगी, को लेकर वहां के लोगों ने विरोध करना शुरू किया. लोग सड़क पर उतर आये और जम  कर रोष प्रकट करते हुए बोले की वह अपने पड़ोस में शराब का ठेका नहीं खुलने देंगे

फिर क्या था, क्षेत्र के विपक्ष के नेता और निर्वाचित प्रतिनिधि भी मैदान  में उतर आये. बस यहां से खेल खराब होना शुरू हुआ और समाज की कमज़ोरी बाहर आ गयी. जहां नेताओं ने क्षेत्र के निवासियों पर एक छोड़ दूसरी या तीसरी पार्टी के मेंबर या अनुगामी होने का इलज़ाम लगाना शुरू किया , वहीँ लोगों में  ‘तरफदारी की बीमारी’ उत्पन्न हो गयी. कुछ लोग दुबक गए, कुछ अलग -अलग नेताओं के सामने बोलने में आनाकानी करने लगे, और कुछ चुप-चाप समझाने में लग गए की शराब की दूकान पास ही में हो, तो क्या बुरा है? विरोध अलग थलग हो गया.

सच तो यह है की वोट आप किसे भी दें, शराब आपके परिवार और बच्चों पर विपरीत असर डालेगी । शराब शरीर में घुस कर तरफदारी तो नहीं करेगी की फलां पार्टी के वोटर को कम चढ़ेगी और फलां पार्टी के वोटर को ज़्यादा। या फिर दुकानदार आपके बच्चे से ये तो नहीं पूंछेगा के ‘बेटा तुम्हारे पिता ने किसको वोट दिया क्योंकि उसके हिसाब से में तुम्हें शराब बेचूंगा या फिर नहीं बेचूंगा।’ जब शराब तरफदारी नहीं करेगी और शराब बेचने वाला नहीं करेगा तो लोग क्यों करने लग गए? क्यों इधर उधर भटक कर एक या फिर दूसरी साइड लेने लगे

ऐसा ही कुछ ट्रैफिक प्लानिंग में दक्षिण दिल्ली की एक अति धनवान कॉलोनी में भी हुआ. अब सब लोग ट्रैफिक में उलझे हैं लेकिन बिना सोचे समझे, ज़िद में, बिना दिमाग लगाए, राजनितिक साइड लेते हुए घर फूँक तमाशा देख रहे हैं

URJA में हम अक्सर देखते हैं की पुब्लिक और RWA अकसर इस तरह साइड लेने लगते हैं की टूटी सड़क, कूड़ा इत्यादि पर किसी भी तरह का कड़ा रुख अपनाया ही नहीं जा सकता। अफसर भी कुछ यूं सोचते हैं “की लड़ने दो इन लोगों को! और हम फ़ालतू में क्यों चक्कर में पड़ें?”

दिल्ली की बैड गवर्नेंस का यही एक बहुत बड़ा कारण है.

समझदारी तो इसमें है की कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जैसे टूटी सड़कें, बर्बाद फुटपाथ, कूड़े के ढेर, सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा, सिक्योरिटी, बह निकलते हुए हुए सीवर, जिस पर हम, चाहे किसी भी पक्ष को वोट देते हों, उस के नेता से साफ़ साफ़ कह दें, की भाई यह नहीं चलेगा। हम किसी भी पार्टी से सरोकार रखते हों लेकिन दो टूक शब्दों में साफ़ साफ़ नेता से कह देना चाहिए कि ‘वोट की बात रही एक तरफ, लेकिन टूटी सड़क, गन्दगी, मच्छर काटने से बीमारी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

जनता से अनुरोध है की, समझदारी इसी में है की बिना सोचे समझे, बिना बुद्धि का प्रयोग करे, तरफदारी बंद कीजिये

आपके इलाके में वैसा शासन है, जैसा आप में से अधिकतम लोग चाहते हैं. जैसी करनी वैसी भरनी; हमारे पूर्वज व्यर्थ ही नहीं कह रहे थे।

आशुतोष दीक्षित

CEO

 

Advertisements
Tagged , , ,